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मप्र के कैलाश सत्यार्थी को नोबल, भारत में 113 साल बाद मिला शांति के लिए सम्मान

मप्र के कैलाश सत्यार्थी को नोबल, भारत में 113 साल बाद मिला शांति के लिए सम्मान

नई दिल्‍ली। शुक्रवार दोपहर करीब दो बजे बचपन बचाओ आंदोलन के संस्‍थापक कैलाश सत्‍यार्थी को वर्ष 2014 का शांति के लिए नोबेल पुरस्‍कार मिलने की उनके स्‍टाफ ने जानकारी दी, तो पहले उन्‍हें विश्‍वास ही नहीं हुआ। फिर अचानक उनके मुंह से निकला, ‘नोबेल पुरस्‍कार’। यह वे पल थे, जब उनकी अांखें पहली बार नम देखी गईं। इससे पहले उनके स्‍टाफ या परिवार के लोगों ने उन्‍हें इतना भावुक नहीं देखा था।

इस प्रतिष्ठित पुरस्‍कार के लिए कैलाश सत्‍यार्थी के नाम की घोषणा होने के बाद वे एकाएक राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय मीडिया की सुर्खियों के केंद्र में आ गए। कालकाजी के एल ब्‍लॉक स्थित उनके दफ्तर में कुछ देर बाद ही हालात यह हो गए कि यह पूरा इलाका मीडिया और लोगों की भीड़ से जाम हो गया। यही नहीं, बचपन बचाओ आंदोलन की वेबसाइट पर भी इतना इंटरनेट ट्रैफिक आया कि वह क्रैश तक हो गई।

1980 से अब तक 82, 625 बच्‍चों को बाल मजदूरी के दंश से छुटकारा दिलाने वाले कैलाश सत्‍यार्थी का मानना है कि अब उनकी जिम्‍मेदारी और बढ़ गई है। वह इसे दुनिया भर के करोड़ों बच्‍चों का सम्‍मान मान रहे हैं। तमाम व्‍यस्‍तताओं के बीच कैलाश सत्‍यार्थी ने dainikbhaskar.com से विशेष बातचीत की। पढ़िए कुछ अंश-

प्रश्‍न: आपको शांति के लिए पाकिस्तानी लडक़ी मलाला के साथ नोबेल पुरस्कार मिला है। कैसे देखते हैं इसे?
कैलाश सत्यार्थी: यह मेरा नहीं, बल्कि उन करोड़ो बच्‍चों का सम्‍मान है, जिनके समाज की मुख्‍य धारा में अब तक कोई पहचान नहीं मिली। जिन्‍हें उनके अधिकार और उनकी आजादी नहीं मिली। आज भी दुनिया भर में करोड़ों बाल श्रमिक हैं। लिहाजा, यह सम्मान उन तमाम सभी बच्चों का है। मैं इस सम्मान को पूरे देश के गर्व के साथ जोड़ कर देखता हूं।

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